पेश है एक ताज़ा तरीन ग़ज़ल जो कल ही लिखी है. आशा है पसंद आयेगी .ये और बात है की इसका मतला बिना मौसम का है मगर जहाँ मैं हूँ वहां आज भी बारिश हो रही है इस लिए सोचा कि आपके सामने रख ही दूं.
कभी हमको डराते हैं कभी तुमको डराते हैं
ये बादल भी न जाने बारिशों में क्या बजाते हैं
ये सूरज ,चाँद ,तारे ,आसमां सब थक के सोये हैं
ये जुगनू रत भर किस्से भला किसको सुनाते हैं
दरिंदों कि ये आवाज़ें लगे है कूक कोयल की
ये आखिर कौन आया है की जंगल गुनगुनाते हैं
कई फनकार हारे हैं नक़ल मुमकिन नहीं उनकी
ये ग़ुल आख़िर कहाँ से ढूंढ कर के रंग लाते हैं
कभी ग़म को हंसाने का बहाना ढूँढना मुश्किल
मगर मुस्कान खोने के बहाने खूब आते हैं
हया,परदे की ये बातें तुम्हीं जानो तुम्हीं समझो
ये बच्चे आज भी बारिश में नंगे ही नहाते हैं
न कोई रहनुमा आगे न कोई मील का पत्थर
ये पंछी आसमां से मंजिलों तक खुद ही जाते हैं
है बरसों से मेरे घर में मुझे ही आजमाता है
चलो इक दिन खुदा के घर उसे भी आजमाते हैं
No comments:
Post a Comment