Friday, September 6, 2013

ये नयापन तो बस ज़बानी है
वक़्त की हर अदा पुरानी है

कौन रोया है बोल ऐ कुदरत
आज दरया में खूब पानी है

दिल किसी एक में नहीं लगता
ये लड़कपन है या जवानी है

हर तरफ सांप घूमते देखे
किसके आँगन में रातरानी है

आप ईमान का करें सौदा
हम करें तो ये बेइमानी है


Saturday, August 17, 2013

दिन की मेहनत से पूछो थका कौन है   
रात  सोयी  है  अब तक जगा कौन है 

कौन पतझड़ पे है यूं फ़िदा और क्यूँ 
ग़ुल की ख़ुशबू से ऐसे ख़फ़ा कौन है 

नौलखे  पर   तेरे  खून  की  बूँद  है 
मोतियों की जगह पर जड़ा कौन है 

फूल तो फूल हैं  पत्तियां  खिल  उठीं 
आज गुलशन में आखिर हंसा कौन है 

सोच  ऊंची  लिये  जा  रहे  हैं  वहाँ 
कद  से  पहचान होगी बड़ा कौन है 

  

Sunday, February 26, 2012

पेश है एक ताज़ा तरीन ग़ज़ल जो कल ही लिखी है. आशा है पसंद आयेगी .ये और बात है की इसका मतला बिना मौसम का है मगर जहाँ मैं हूँ वहां आज भी बारिश हो रही है इस लिए सोचा कि आपके सामने रख ही दूं.


कभी हमको डराते हैं  कभी तुमको डराते हैं 
ये बादल भी न जाने बारिशों में क्या बजाते हैं 

ये सूरज ,चाँद ,तारे ,आसमां सब थक के सोये हैं 
ये जुगनू रत भर किस्से भला किसको सुनाते हैं 

दरिंदों कि ये आवाज़ें लगे है कूक कोयल की
ये आखिर कौन आया है की जंगल गुनगुनाते  हैं 

कई फनकार हारे हैं नक़ल मुमकिन नहीं उनकी 
ये ग़ुल आख़िर कहाँ से ढूंढ कर के रंग लाते हैं 

कभी ग़म को  हंसाने का बहाना ढूँढना मुश्किल 
मगर मुस्कान खोने के बहाने खूब आते हैं 

हया,परदे की ये बातें तुम्हीं जानो तुम्हीं समझो   
ये बच्चे आज भी बारिश में नंगे ही नहाते हैं

न कोई रहनुमा आगे न कोई मील का पत्थर 
ये पंछी आसमां से मंजिलों तक खुद ही जाते हैं

है बरसों से मेरे घर में मुझे ही आजमाता है
चलो इक दिन खुदा के घर उसे भी आजमाते हैं    




Friday, February 17, 2012

प्रिय दोस्तों ,

 देर आयद दुरुस्त आयद ,
ये ब्लॉग बनाया था २००९ में , मगर इसे आज पहली दफा लिख पाया हूँ .
आज बस इतना ही लिखूंगा कि अगर ठान ली तो बस कर के छोड़ो .
बस एक माह पहले एक ग़ज़ल कही  थी आपके सामने पेश है.

बाप- माँ  बूढ़े  हुए  बच्चे  सयाने  हो  गए
आंधियां आने को हैं  छप्पर पुराने हो गए 

                   सिर्फ कुछ लोगों की हैं जागीर ये दैरो-हरम1     (1-धर्मस्थान)
देवता  मजदूर  मंदिर  कारखाने  हो  गए 

वो ही प्यादे , वो ही राजा, वो चलेंगे दांव भी 
हम तो बस शतरंज के चौकोर खाने हो गए 

खूब चिड़ियाघर बने, क्या आदमीघर हैं कहीं 
आदमी  देखे  हुए  हमको  ज़माने  हो  गए   

अब खुदा का नाम लेना  काम हो कर रह गया
 मायने  इमदाद  के  बस  आठ  आने हो गए